Monday, November 02, 2026

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विकास की सड़क बनाते हाथ ही बुझ गए! झुंझुनूं हादसे से उठता सबसे बड़ा सवाल—क्या मजदूरों की जान इतनी सस्ती है?

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 आठ मजदूरों की मौत, पाँच घायल और कई परिवारों की दुनिया उजड़ गई। आखिर विकास की कीमत मजदूरों को अपनी जान देकर क्यों चुकानी पड़ती है?

आज राजस्थान के झुंझुनूं जिले से आई खबर ने मन को भीतर तक विचलित कर दिया।

उदयपुरवाटी क्षेत्र के छापोली गाँव में सड़क निर्माण का काम चल रहा था। इसी दौरान बजरी मिलाने वाली मशीन ऊपर से गुजर रही 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन बिजली लाइन के संपर्क में आ गई। मशीन में करंट फैल गया और वहाँ काम कर रहे मजदूर इसकी चपेट में आ गए।

इस दर्दनाक हादसे में आठ मजदूरों की जान चली गई, जबकि पाँच अन्य घायल हो गए।

आठ लोग अपने घरों से काम पर निकले होंगे। किसी ने सोचा होगा कि शाम को घर लौटकर बच्चों के साथ समय बिताएगा, किसी ने परिवार के लिए कुछ पैसे कमाने का सपना देखा होगा।

लेकिन शाम आने से पहले ही आठ परिवारों की दुनिया बदल गई।

कुछ घरों में अब पिता नहीं लौटेंगे, कुछ बच्चों के सिर से कमाने वाले का साया उठ गया और कुछ परिवारों के सामने आने वाला कल एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया।

सड़क बन गई या नहीं, यह बाद की बात है। लेकिन जिन हाथों ने सड़क बनाने का काम किया, वे ही आज इस दुनिया में नहीं रहे।

आखिर हुआ क्या था?

2 नवंबर 2026 को झुंझुनूं जिले के छापोली गाँव में छापोली से कदमकुंड की ओर जाने वाले मार्ग पर सड़क निर्माण का कार्य चल रहा था।

पुलिस के अनुसार, सड़क निर्माण में इस्तेमाल की जा रही बजरी मिलाने वाली मशीन ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन लाइन के संपर्क में आ गई। मशीन में बिजली का करंट फैलने से वहाँ काम कर रहे मजदूर इसकी चपेट में आ गए।

इस घटना में आठ लोगों की मृत्यु हुई और पाँच लोग घायल हुए।

प्रारंभिक समाचार रिपोर्टों के अनुसार, सड़क का निर्माण स्थानीय लोगों के सहयोग से कराया जा रहा था। राज्य सरकार की ओर से उच्चस्तरीय जाँच के निर्देश दिए गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस घटना पर दुख व्यक्त किया और प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से प्रत्येक मृतक के निकटतम परिजन को दो लाख रुपये तथा प्रत्येक घायल को पचास हजार रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जिला प्रशासन और ग्रामीणों के बीच बातचीत के बाद मृतकों के परिवारों को 15 लाख रुपये मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को संविदा पर नौकरी देने का आश्वासन भी दिया गया।

लेकिन सवाल केवल मुआवजे का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा हादसा हुआ क्यों?

विकास जरूरी है, लेकिन सुरक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी है

हम अक्सर विकास की बातें करते हैं।

नई सड़कें, बड़े पुल, हाईवे, औद्योगिक क्षेत्र, स्मार्ट सिटी और आधुनिक सुविधाएँ—ये सब किसी भी देश और राज्य की प्रगति के महत्वपूर्ण संकेत हैं।

हम चाहते हैं कि गाँवों तक अच्छी सड़कें पहुँचें, लोगों को बेहतर आवागमन मिले और विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

लेकिन क्या विकास का अर्थ केवल निर्माण कार्य पूरा कर देना है?

क्या किसी परियोजना की सफलता केवल इस बात से तय होगी कि सड़क कितने दिनों में बन गई?

मेरा मानना है कि किसी भी निर्माण कार्य की असली सफलता तभी है, जब काम पूरा होने के बाद भी उसे बनाने वाले मजदूर सुरक्षित अपने घर लौटें।

जिस विकास में मजदूर की जान सुरक्षित नहीं, उस विकास की गुणवत्ता और व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सड़क पर चलने वाले लोगों की सुविधा जितनी महत्वपूर्ण है, उस सड़क को बनाने वाले मजदूर की जिंदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

हाईटेंशन लाइन के नीचे काम हो रहा था, तो सुरक्षा योजना कहाँ थी?

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।

जब किसी स्थान पर सड़क निर्माण किया जाता है और वहाँ से हाईटेंशन बिजली की लाइन गुजर रही होती है, तब काम शुरू करने से पहले सुरक्षा का आकलन कौन करता है?

क्या मशीन की ऊँचाई और उसके ऊपर लगे लोहे के पाइप की स्थिति देखी गई थी?

क्या बिजली लाइन की सुरक्षित दूरी का आकलन किया गया था?

क्या संबंधित बिजली विभाग या लाइन के मालिक से समन्वय किया गया था?

क्या कार्यस्थल पर प्रशिक्षित पर्यवेक्षक मौजूद था?

क्या मजदूरों को संभावित खतरे के बारे में बताया गया था?

क्या किसी ने यह जाँचा कि मशीन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते समय भी बिजली की लाइन से खतरा हो सकता है?

ये सवाल किसी को पहले से दोषी ठहराने के लिए नहीं हैं। इनका उत्तर निष्पक्ष जाँच से मिलना चाहिए।

लेकिन इन सवालों को पूछना बहुत जरूरी है, क्योंकि दुर्घटना के बाद केवल संवेदना व्यक्त कर देने से ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं।

नियम-कानून केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर भी दिखने चाहिए

भारत में बिजली सुरक्षा के लिए केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण यानी Central Electricity Authority के अपने सुरक्षा नियम हैं।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के 2023 के सुरक्षा विनियमों में बिजली की ओवरहेड लाइनों के पास निर्माण अथवा सड़क के स्तर में बदलाव जैसे कामों के लिए संबंधित बिजली आपूर्तिकर्ता या लाइन के स्वामी और विद्युत निरीक्षक को लिखित सूचना देने से संबंधित प्रावधान हैं।

इन नियमों में बिजली लाइनों के पास सामग्री और उपकरणों को सुरक्षित तरीके से ले जाने तथा आवश्यक सुरक्षा दूरी बनाए रखने की व्यवस्थाएँ भी हैं।

बिजली से संबंधित कार्यों के लिए खतरे का आकलन, कर्मचारियों को सुरक्षा संबंधी जानकारी, आवश्यक अनुमति, लाइन को सुरक्षित रूप से बंद और अर्थ किया जाना तथा पर्याप्त निगरानी जैसे उपाय भी निर्धारित हैं।

अर्थात सुरक्षा के सिद्धांत और नियम पहले से मौजूद हैं।

अब आवश्यकता इस बात की है कि जाँच में यह देखा जाए कि इस घटना पर कौन-कौन से नियम लागू होते थे और उनका पालन हुआ या नहीं।

सवाल यह नहीं होना चाहिए कि नियम मौजूद थे या नहीं। सवाल यह होना चाहिए कि जिन लोगों की सुरक्षा के लिए नियम बनाए गए, क्या वास्तव में उनकी सुरक्षा की गई?

जाँच केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए

मुख्यमंत्री द्वारा उच्चस्तरीय जाँच के निर्देश देना जरूरी कदम है। लेकिन जाँच का परिणाम केवल एक रिपोर्ट बनकर फाइल में बंद नहीं होना चाहिए।

मेरे विचार से इस घटना की जाँच में कम-से-कम इन बिंदुओं को स्पष्ट किया जाना चाहिए:

  1. सड़क निर्माण का काम किसकी अनुमति और निगरानी में चल रहा था?

  2. क्या निर्माण स्थल के आसपास मौजूद हाईटेंशन लाइन की पहचान और जोखिम का आकलन किया गया था?

  3. क्या बिजली विभाग अथवा संबंधित लाइन के स्वामी को काम की जानकारी दी गई थी?

  4. क्या मशीन और उसके लोहे के पाइप को सुरक्षित तरीके से चलाने की व्यवस्था थी?

  5. क्या कार्यस्थल पर प्रशिक्षित पर्यवेक्षक और जरूरी सुरक्षा इंतजाम मौजूद थे?

  6. यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है?

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि दुर्घटना में किस संस्था, ठेकेदार, कार्य आयोजक या संबंधित विभाग की क्या भूमिका थी।

बिना तथ्यों के किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन जाँच के नाम पर जिम्मेदारी तय करने से बचना भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

जिम्मेदारी चाहे किसी की भी निकले, कार्रवाई निष्पक्ष और स्पष्ट होनी चाहिए।

मुआवजा जरूरी है, लेकिन क्या किसी परिवार की दुनिया वापस आ सकती है?

हादसे के बाद आर्थिक सहायता की घोषणा और जिला प्रशासन द्वारा मुआवजे तथा नौकरी का आश्वासन राहत की दिशा में जरूरी कदम हैं।

लेकिन एक सवाल मन में आता है।

जिस बच्चे ने अपने पिता को खो दिया, क्या वह मुआवजे से पिता को वापस पा सकता है?

जिस पत्नी ने अपना जीवनसाथी खो दिया, क्या कोई आर्थिक सहायता उसके जीवन का खालीपन भर सकती है?

जिस माता-पिता ने अपना जवान बेटा खो दिया, क्या कोई नौकरी या सहायता उनके घर की खुशियाँ लौटा सकती है?

नहीं।

मुआवजा परिवार को आर्थिक सहारा दे सकता है, लेकिन किसी इंसान की कमी पूरी नहीं कर सकता।

इसलिए सहायता के साथ-साथ यह सुनिश्चित होना चाहिए कि मृतकों के परिवारों को घोषित आर्थिक मदद वास्तव में मिले, घायल लोगों का उचित उपचार हो और उनके भविष्य के लिए आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराया जाए।

प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि घोषित सहायता की राशि किस मद से मिलेगी और उसकी प्रक्रिया क्या होगी।

मुआवजा पीड़ित परिवार का सहारा है, लेकिन जवाबदेही व्यवस्था का कर्तव्य है।

मजदूर कोई मशीन का पुर्जा नहीं है

हमारे देश में मजदूर वर्ग का योगदान बहुत बड़ा है।

जिस घर में हम आराम से रहते हैं, जिस सड़क पर गाड़ी चलाते हैं, जिस पुल से नदी पार करते हैं और जिस इमारत में कार्यालय चलाते हैं—इन सबके पीछे किसी न किसी मजदूर का पसीना लगा होता है।

लेकिन अफसोस की बात है कि निर्माण स्थल पर काम करने वाले मजदूर की सुरक्षा कई बार सबसे आखिरी प्राथमिकता बन जाती है।

मजदूर का काम केवल मजदूरी लेना और काम पूरा करना नहीं है। उसका भी परिवार है, उसके भी सपने हैं और उसे भी सुरक्षित घर लौटने का पूरा अधिकार है।

किसी भी ठेकेदार, निर्माण एजेंसी, परियोजना संचालक या संबंधित विभाग के लिए मजदूरों की सुरक्षा को अतिरिक्त खर्च मानना गलत है।

हेलमेट, सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षित निगरानी, बिजली लाइनों से सुरक्षित दूरी और काम शुरू करने से पहले जोखिम की जाँच—ये किसी पर एहसान नहीं, बल्कि सुरक्षित कार्यस्थल की बुनियादी जरूरतें हैं।

अब आगे क्या होना चाहिए?

मैं सरकार और संबंधित प्रशासन से कुछ सीधी अपेक्षाएँ रखता हूँ।

पहली, झुंझुनूं हादसे की जाँच समयबद्ध तरीके से पूरी हो और उसकी प्रमुख बातें सार्वजनिक की जाएँ।

दूसरी, मृतकों के परिवारों को घोषित मुआवजे और नौकरी संबंधी आश्वासन का लाभ बिना अनावश्यक देरी के मिले।

तीसरी, घायलों को बेहतर चिकित्सा सुविधा और आगे के उपचार में आवश्यक सहयोग मिले।

चौथी, राजस्थान में जहाँ भी बिजली की हाईटेंशन लाइनों के आसपास सड़क, भवन या अन्य निर्माण कार्य चल रहे हैं, वहाँ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जाए।

पाँचवीं, सरकारी हो या निजी, छोटे स्तर का स्थानीय निर्माण हो या बड़ी परियोजना—हर जगह मजदूरों की सुरक्षा को अनिवार्य प्राथमिकता बनाया जाए।

और सबसे महत्वपूर्ण, यदि जाँच में किसी की लापरवाही सामने आती है, तो केवल निलंबन या औपचारिक कार्रवाई तक मामला सीमित न रहे। कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो।

मेरी बात, मेरी सोच

मैं विकास का विरोधी नहीं हूँ। मैं चाहता हूँ कि राजस्थान आगे बढ़े, हमारे गाँवों में अच्छी सड़कें बनें, शहर आधुनिक हों और हर नागरिक को बेहतर सुविधाएँ मिलें।

लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि विकास का मतलब केवल सीमेंट, लोहे और डामर से नई संरचनाएँ खड़ी करना नहीं है।

विकास का अर्थ है—एक सुरक्षित समाज, जिम्मेदार प्रशासन और सम्मान के साथ जीवन जीता हुआ आम नागरिक।

झुंझुनूं के छापोली गाँव में जिन आठ लोगों ने अपनी जान गंवाई, वे केवल समाचार की आठ संख्याएँ नहीं हैं। वे आठ परिवारों की उम्मीदें थे।

उनकी मौत हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि क्या किसी भी निर्माण कार्य की शुरुआत मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना होनी चाहिए?

क्या हम हर हादसे के बाद कुछ आर्थिक सहायता देकर अगली घटना का इंतजार करेंगे?

क्या मजदूरों की सुरक्षा के लिए कोई स्थायी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती?

आज जरूरत केवल शोक व्यक्त करने की नहीं, बल्कि व्यवस्था को मजबूत करने की है।

मैं उन सभी दिवंगत आत्माओं को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और घायल लोगों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ।

ईश्वर प्रभावित परिवारों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।

क्योंकि सड़कें बनाना विकास है, लेकिन उन सड़कों को बनाने वाले हाथों को सुरक्षित रखना सभ्यता है।

और मेरी नजर में—

विकास वही सच्चा है, जिसमें कोई मजदूर अपने परिवार की खुशियों के लिए काम पर जाए और शाम को सकुशल अपने घर लौटे।

ॐ शांति। 🙏

— देव वैदिक

मेरी सोच… मेरे शब्द… समाज और देश के बेहतर भविष्य के लिए…

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Thursday, October 29, 2026

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करवा चौथ की रात: चाँद तो निकल आया, क्या रिश्तों में भी उजाला है?

एक व्रत, एक परंपरा और एक सवाल—क्या प्रेम केवल निभाई जाने वाली रस्म है, या जीवन भर निभाई जाने वाली जिम्मेदारी भी?

चाँद तो निकल आया… क्या रिश्तों में भी उजाला है?

आज करवा चौथ की रात है।

कहीं सजी हुई पूजा की थाली है, कहीं हाथों में रची मेहंदी, कहीं लाल जोड़े में सजी पत्नी अपने चाँद का इंतजार कर रही है, तो कहीं पति भी अपनी पत्नी के साथ इस परंपरा में सहभागी बना हुआ है।

आसमान में चाँद निकलने का इंतजार है। घरों में उत्साह है। तस्वीरें बन रही हैं, शुभकामनाएँ दी जा रही हैं और रिश्तों के लिए मंगलकामनाएँ की जा रही हैं।

लेकिन आज इस सुंदर परंपरा के बीच मेरे मन में एक सवाल उठता है—

चाँद तो हर साल निकलता है, लेकिन क्या हमारे रिश्तों में भी हर साल थोड़ा और उजाला बढ़ता है?

करवा चौथ केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं

हमारी सनातन संस्कृति की खूबसूरती यही है कि इसके त्योहार केवल कैलेंडर पर दर्ज तारीखें नहीं हैं। उनके साथ भावनाएँ, पारिवारिक स्मृतियाँ, आस्था और जीवन के संस्कार जुड़े होते हैं।

करवा चौथ पर विवाहित महिलाएँ अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। दिन भर उपवास, शाम की पूजा, व्रत कथा और चंद्रमा के दर्शन—इन सबके साथ एक गहरी भावनात्मक परंपरा जुड़ी है।

मेरे विचार से इस पर्व को केवल पुराने रीति-रिवाज के रूप में देखना इसके भाव को सीमित करना होगा।

किसी के लिए यह पति के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है, किसी के लिए परिवार से मिली परंपरा, तो किसी के लिए अपनी आस्था से जुड़ने का अवसर।

हमारे यहाँ हर व्यक्ति की आस्था का तरीका एक जैसा नहीं होता। कोई निर्जला व्रत रखता है, कोई अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार पूजा करता है और कोई अपनी भावना से इस दिन को मनाता है।

आस्था का अर्थ दिखावा नहीं, बल्कि मन की सच्चाई है।

पत्नी का समर्पण अनमोल है, लेकिन पति की जिम्मेदारी भी कम नहीं

यहाँ मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ।

जब एक पत्नी अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए पूरे मन से व्रत रखती है, तो उसकी भावना का सम्मान होना चाहिए। उस आस्था का मजाक उड़ाना या उसे केवल अंधविश्वास कहकर खारिज कर देना उचित नहीं है।

लेकिन क्या प्रेम और जिम्मेदारी केवल पत्नी की तरफ से ही होनी चाहिए?

क्या पति का कोई कर्तव्य नहीं?

क्या पत्नी के व्रत के दिन पति का काम केवल नए कपड़े पहनना, तस्वीर खिंचवाना और सोशल मीडिया पर प्रेम भरा संदेश लिखना है?

मेरा मानना है कि पति का असली प्रेम तब दिखाई देता है, जब वह पत्नी की थकान को समझता है, उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखता है, घर की जिम्मेदारियों में उसका साथ देता है और उसकी भावनाओं को महत्व देता है।

उसे केवल त्योहार के दिन नहीं, बल्कि साधारण दिनों में भी सम्मान मिलना चाहिए।

जिस रिश्ते में पत्नी अपने पति की लंबी आयु की कामना करती है, उस रिश्ते में पति को भी पत्नी के सम्मान, स्वास्थ्य और खुशियों की रक्षा का संकल्प लेना चाहिए।

और यह संकल्प केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।

सनातन परंपरा बोझ नहीं, भावना बनकर जीवित रहती है

आजकल त्योहारों पर एक अलग तरह की बहस देखने को मिलती है।

कुछ लोग हर परंपरा पर सवाल उठाते हैं, तो कुछ लोग हर परंपरा को बिना समझे निभाने पर जोर देते हैं।

मेरे विचार से दोनों स्थितियों में संतुलन आवश्यक है।

हमारी परंपराओं को समझना चाहिए, उनके पीछे की भावनाओं को जानना चाहिए और उन्हें अगली पीढ़ी तक सम्मानपूर्वक पहुँचाना चाहिए।

लेकिन परंपरा के नाम पर किसी को अपमानित करना, किसी की व्यक्तिगत स्थिति को नजरअंदाज करना या प्रेम को जबरदस्ती में बदल देना भी सही नहीं है।

सनातन संस्कृति की सुंदरता केवल अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि उन मूल्यों में भी है जो हमें परिवार, संयम, कर्तव्य, संवेदना और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का पाठ पढ़ाते हैं।

हर महिला व्रत रखे, यह अपेक्षा करने से पहले यह समझना जरूरी है कि व्रत उसकी आस्था और इच्छा से जुड़ा विषय है। इसी तरह, जो महिला व्रत रखती है, उसकी भावना का सम्मान करना भी जरूरी है।

परंपरा का सम्मान और व्यक्ति की गरिमा—दोनों साथ चल सकते हैं।

चाँद को छलनी से देखते हैं, कभी अपने व्यवहार को भी देखिए

करवा चौथ पर पत्नी छलनी से चाँद को देखती है और फिर अपने जीवनसाथी का चेहरा देखकर व्रत खोलती है।

यह दृश्य अपने आप में कितना सुंदर है!

लेकिन कल्पना कीजिए, अगर इस रस्म के साथ हर पति अपने मन में कुछ सवाल भी पूछे—

क्या मैंने अपनी पत्नी की बात ध्यान से सुनी?

क्या मैंने उसके सपनों और इच्छाओं को उतना ही महत्व दिया जितना अपने सपनों को?

क्या घर और परिवार की जिम्मेदारियों में मैंने उसका साथ दिया?

क्या मैंने कभी उसके त्याग को इतना सामान्य मान लिया कि उसके लिए धन्यवाद कहना भी भूल गया?

और क्या मेरी पत्नी मेरे साथ रहते हुए सम्मानित, सुरक्षित और खुश महसूस करती है?

ये सवाल किसी एक दिन के लिए नहीं हैं। ये हर उस व्यक्ति के लिए हैं जो विवाह को केवल एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि जीवन भर का साथ मानता है।

पति-पत्नी का रिश्ता केवल प्रेम के बड़े-बड़े वादों से मजबूत नहीं होता। वह छोटी-छोटी बातों से मजबूत होता है—एक-दूसरे को समय देने से, गलतियों को स्वीकार करने से, कठिन दिनों में साथ खड़े रहने से और असहमति के बावजूद सम्मान बनाए रखने से।

कई बार एक कप पानी देना, बिना कहे किसी काम में हाथ बँटा देना या थके हुए जीवनसाथी की बात चुपचाप सुन लेना, किसी महँगे उपहार से ज्यादा मायने रखता है।

सोशल मीडिया की तस्वीरों से आगे भी एक दुनिया है

आज त्योहारों के साथ सोशल मीडिया भी जुड़ गया है।

सुंदर कपड़े, आभूषण, मेहंदी, सजावट और चाँद के साथ तस्वीरें—इन सबका अपना आनंद है। उत्सव की खुशी बाँटना गलत नहीं है।

लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि तस्वीर में दिखाई देने वाली मुस्कान किसी रिश्ते की पूरी कहानी नहीं होती।

किसी रिश्ते की असली सुंदरता कैमरे के सामने नहीं, बल्कि उस समय सामने आती है जब जीवन कठिन हो जाता है।

बीमारी में साथ कौन देता है? आर्थिक परेशानी में कौन हिम्मत बँधाता है? असफलता के समय कौन भरोसा बनाए रखता है? जब मन टूटता है, तब कौन हाथ पकड़ता है?

ये वे पल हैं जो बताते हैं कि रिश्ता कितना मजबूत है।

इसलिए करवा चौथ की तस्वीर जरूर खींचिए, एक-दूसरे को उपहार भी दीजिए और खुशी भी मनाइए। लेकिन उस एक तस्वीर के पीछे ऐसा जीवन भी बनाइए, जिसमें दोनों को प्रेम और सम्मान मिले।

क्या पति भी व्रत रख सकता है?

बिल्कुल, अगर वह अपनी इच्छा और आस्था से ऐसा करना चाहता है।

आज कई पति भी अपनी पत्नी के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से व्रत रखते हैं। इसे प्रेम की एक सुंदर अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।

लेकिन मेरे विचार से प्रेम साबित करने के लिए व्रत रखना अनिवार्य नहीं है। जिस प्रकार पत्नी के व्रत को उसकी आस्था के रूप में सम्मान मिलना चाहिए, उसी प्रकार पति के किसी अलग तरीके से प्रेम जताने को भी समझा जाना चाहिए।

व्रत रखने वाला श्रेष्ठ और न रखने वाला कम प्रेम करने वाला—ऐसा फैसला हमें नहीं करना चाहिए।

आखिर किसी रिश्ते की परीक्षा एक दिन के उपवास से नहीं, बल्कि जीवन भर के व्यवहार से होती है।

जिस घर में दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हैं, एक-दूसरे के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं और एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, वहाँ प्रेम के लिए किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होती।

मेरी बात, मेरी सोच

मैं अपनी सनातन परंपराओं का सम्मान करता हूँ। मेरा मानना है कि त्योहारों को केवल औपचारिकता मानकर छोड़ देने के बजाय उनके सांस्कृतिक और भावनात्मक अर्थ को समझना चाहिए।

करवा चौथ की परंपरा में मुझे केवल एक व्रत दिखाई नहीं देता। मुझे उसमें किसी अपने के लिए मंगलकामना दिखाई देती है, साथ निभाने का भाव दिखाई देता है और परिवार को जोड़ने वाली एक सांस्कृतिक स्मृति दिखाई देती है।

लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि इस भावना को जीवन के हर दिन में उतरना चाहिए।

अगर आज पत्नी अपने पति की लंबी आयु के लिए प्रार्थना कर रही है, तो पति भी उसके स्वास्थ्य और सम्मान का ध्यान रखने का संकल्प ले।

अगर आज दोनों एक-दूसरे के साथ तस्वीर खिंचवा रहे हैं, तो कल भी एक-दूसरे के साथ खड़े रहें।

अगर आज दोनों प्रेम के शब्द कह रहे हैं, तो कल किसी कठिन परिस्थिति में उन शब्दों का अर्थ भी निभाएँ।

क्योंकि विवाह का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के जीवन को बेहतर बनाना भी है।

चाँद हर महीने घटता-बढ़ता है, लेकिन रिश्तों में प्रेम, विश्वास और सम्मान बढ़ते रहना चाहिए।

आज करवा चौथ पर मेरी यही कामना है कि हर घर में सुख और शांति रहे, हर रिश्ते में विश्वास बना रहे और हर पति-पत्नी को एक-दूसरे का सच्चा सहारा बनने की शक्ति मिले।

व्रत की पवित्रता बनी रहे, परंपरा का सम्मान बना रहे और प्रेम केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन भर निभाया जाने वाला धर्म बने।

क्योंकि अंत में बात इतनी-सी है—

चाँद को देखकर व्रत खोलना एक परंपरा है; जीवनसाथी के चेहरे पर मुस्कान बनाए रखना भी प्रेम की एक साधना है।

जय श्री राम! 🙏

हर हर महादेव! 🕉️

— देव वैदिक

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारी सनातन संस्कृति के लिए…

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Tuesday, October 27, 2026

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चक्रवात अर्नब: संकट में सबसे बड़ा धर्म—मानव सेवा!

चक्रवात अर्नब: संकट में सबसे बड़ा धर्म मानव सेवा क्यों है? | देव वैदिक

जब प्रकृति परीक्षा लेती है, तब इंसानियत और प्रशासन की असली पहचान होती है

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…

🙏 नमस्कार दोस्तों!

आज मन में कुछ गंभीर बातें हैं, जिन्हें आपसे साझा करना चाहता हूँ।

जब समुद्र में तूफान उठता है, आसमान में बादल घिरते हैं और तेज हवाएँ लोगों के घरों की ओर बढ़ती हैं, तब जीवन का सबसे बड़ा सवाल सामने आ जाता है—

जान कैसे बचेगी?

किसी मछुआरे का परिवार अपने घर की चिंता कर रहा होगा।

कोई माँ अपने बच्चों को सुरक्षित रखने की तैयारी कर रही होगी।

कोई बुजुर्ग अपने घर को छोड़कर राहत शिविर जाने को मजबूर होगा।

और कोई मेहनतकश व्यक्ति सोच रहा होगा कि इस तूफान के बाद उसका घर, उसकी दुकान और उसकी रोजी-रोटी किस हालत में होगी।

इन परिस्थितियों में धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर एक ही बात सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है—

इंसान की जान बचाना।

आज बंगाल की खाड़ी में सक्रिय चक्रवात अर्नब इसी बात की याद दिलाता है कि प्रकृति के सामने इंसान को साहस के साथ-साथ तैयारी, समझदारी और एकजुटता की भी जरूरत होती है।

आइए, आज इस विषय पर अपनी बात रखते हैं।

1. जब समुद्र में तूफान उठता है, तब सबसे पहले इंसान की जान महत्वपूर्ण होती है

27 अक्टूबर 2026 की खबरों के अनुसार, चक्रवात अर्नब बंगाल की खाड़ी के पश्चिम-मध्य हिस्से में अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान के रूप में आगे बढ़ रहा था।

भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अनुमान व्यक्त किया था कि यह 28 अक्टूबर की सुबह बापटला और विशाखापत्तनम के बीच आंध्र प्रदेश–यानम तट को पार कर सकता है।

तेज हवाएँ, भारी बारिश, समुद्र में ऊँची लहरें और निचले इलाकों में पानी भरने का खतरा इस परिस्थिति को गंभीर बनाते हैं।

Associated Press की 27 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, आंध्र प्रदेश में लगभग 89,000 लोगों को जोखिम वाले तटीय क्षेत्रों से सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा चुका था। राहत एवं बचाव के लिए हजारों आश्रय स्थलों और चिकित्सा टीमों की व्यवस्था की गई थी। ओडिशा में भी प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने की तैयारी की जा रही थी।

तथ्यात्मक संदर्भ: Associated Press की रिपोर्ट

जरा सोचिए।

अपने घर को छोड़ना किसी के लिए भी आसान नहीं होता।

घर में वर्षों की मेहनत लगी होती है।

खेत, मछली पकड़ने की नाव, दुकान, पशु और घर का सामान—सब कुछ उसी जीवन का हिस्सा होते हैं।

लेकिन जब प्रशासन लोगों से सुरक्षित स्थान पर जाने की अपील करता है, तो उस समय सावधानी बरतना जीवन बचाने का सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

जान बचाना पहली प्राथमिकता है। संपत्ति और बाकी चीजों को बाद में सँभाला जा सकता है।

2. प्रकृति के सामने घमंड नहीं, तैयारी काम आती है

हम अक्सर कहते हैं कि इंसान ने विज्ञान और तकनीक में बहुत तरक्की कर ली है।

हमारे पास आधुनिक संचार व्यवस्था है।

मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए वैज्ञानिक उपकरण हैं।

उपग्रह हैं।

आपदा प्रबंधन की टीमें हैं।

राहत शिविर हैं।

लेकिन प्रकृति का प्रकोप यह भी याद दिलाता है कि तैयारी में थोड़ी-सी लापरवाही कितनी महँगी पड़ सकती है।

तूफान को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके नुकसान को कम करने के लिए तैयारी की जा सकती है।

समय पर चेतावनी दी जा सकती है।

जोखिम वाले इलाकों से लोगों को निकाला जा सकता है।

बिजली और संचार व्यवस्था की सुरक्षा के उपाय किए जा सकते हैं।

जरूरी दवाएँ, भोजन, पीने का पानी और राहत सामग्री उपलब्ध कराई जा सकती है।

और सबसे महत्वपूर्ण, लोगों को सही तथा स्पष्ट जानकारी दी जा सकती है।

प्राकृतिक आपदा को पूरी तरह रोकना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन उसके सामने अपनी तैयारी कितनी मजबूत रखनी है, यह हमारी जिम्मेदारी है।

3. संकट में सरकार की असली परीक्षा होती है

जब देश में सब कुछ सामान्य चल रहा होता है, तब किसी सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करना अपेक्षाकृत आसान लगता है।

लेकिन जब हजारों परिवारों पर संकट मंडराने लगे, तब प्रशासन की वास्तविक क्षमता सामने आती है।

क्या समय पर चेतावनी जारी हुई?

क्या प्रभावित लोगों तक सूचना पहुँची?

क्या बुजुर्गों, बच्चों, दिव्यांगों और बीमार व्यक्तियों के लिए सुरक्षित निकासी की व्यवस्था हुई?

क्या राहत शिविरों में साफ पानी, भोजन, शौचालय और चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध हैं?

क्या बिजली, सड़क और संचार जैसी आवश्यक सेवाओं को सुरक्षित रखने की तैयारी है?

और क्या आपदा के बाद लोगों को उनका जीवन दोबारा शुरू करने में सहायता मिलेगी?

भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो की 26 अक्टूबर की जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति ने चक्रवात की तैयारियों की समीक्षा की थी। संबंधित राज्य सरकारों ने राहत एवं बचाव की तैयारियों, आश्रय स्थलों और आपदा प्रतिक्रिया टीमों की उपलब्धता की जानकारी दी थी।

संदर्भ: PIB — चक्रवात की तैयारियों की समीक्षा

मेरे विचार से संकट के समय सरकार का मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं होना चाहिए।

जमीन पर लोगों तक सहायता कितनी जल्दी पहुँची, कमजोर वर्गों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हुई और नुकसान के बाद पुनर्वास कितना प्रभावी रहा—ये भी महत्वपूर्ण कसौटियाँ हैं।

मैं चाहता हूँ कि सरकारें अच्छा काम करें और उनकी सराहना भी हो।

लेकिन जहाँ सुधार की जरूरत हो, वहाँ तथ्यात्मक सवाल पूछना भी जरूरी है।

सरकार की सफलता का असली अर्थ है—संकट के समय जनता का जीवन सुरक्षित रखना और उसे भरोसा देना कि व्यवस्था उसके साथ खड़ी है।

4. राष्ट्रहित केवल भाषण नहीं, संकट में सेवा भी है

मैं अपनी राष्ट्रवादी सोच को लेकर स्पष्ट हूँ।

मेरे लिए राष्ट्र केवल नक्शे पर बनी सीमाओं का नाम नहीं है।

राष्ट्र उसके नागरिकों से बनता है।

उनके घरों से बनता है।

उनके खेतों, दुकानों, स्कूलों, अस्पतालों और मेहनत से बनता है।

अगर किसी आपदा में हजारों परिवार संकट में हैं, तो उनकी सहायता करना भी राष्ट्रसेवा है।

सीमा पर देश की रक्षा करने वाले जवान महत्वपूर्ण हैं।

वैज्ञानिक महत्वपूर्ण हैं।

डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी महत्वपूर्ण हैं।

और आपदा के समय लोगों की जान बचाने वाले कर्मचारी, स्वयंसेवक तथा राहतकर्मी भी उतने ही सम्मान के पात्र हैं।

किसी गाँव में कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाता है।

कोई युवा राहत सामग्री पहुँचाने में मदद करता है।

कोई डॉक्टर अतिरिक्त समय देकर मरीजों की सहायता करता है।

कोई स्वयंसेवक राहत शिविर में भोजन बाँटता है।

ये सभी अपने-अपने तरीके से समाज की सेवा कर रहे हैं।

राष्ट्रप्रेम केवल नारे लगाने से नहीं, जरूरत पड़ने पर अपने देशवासियों के साथ खड़े होने से भी दिखाई देता है।

5. सनातन धर्म हमें सेवा और करुणा का भाव सिखाता है

मैं सनातनी हिंदू हूँ और अपनी संस्कृति पर गर्व करता हूँ।

मेरे लिए पूजा-पाठ, मंत्र जप, धार्मिक परंपराएँ और संस्कार जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि धर्म का प्रभाव हमारे आचरण में दिखाई देना चाहिए।

अगर हम ईश्वर से अपने परिवार की सुरक्षा माँगते हैं, तो संकट में पड़े दूसरे परिवारों के प्रति संवेदनशील होना भी जरूरी है।

अगर हम मंदिर में दीपक जलाते हैं, तो किसी जरूरतमंद के जीवन में आशा जगाने का प्रयास भी सुंदर कार्य है।

अगर हम अपने लिए शांति की प्रार्थना करते हैं, तो दूसरों के दुःख को कम करने के लिए भी आगे आना चाहिए।

भारतीय परंपरा में “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की प्रार्थना हमें सबके कल्याण की भावना की याद दिलाती है।

मेरे विचार से इस भावना का अर्थ केवल पूजा के समय श्लोक बोलना नहीं, बल्कि जहाँ संभव हो, दूसरों के कल्याण के लिए काम करना भी है।

और सेवा करने के लिए यह पूछना जरूरी नहीं कि सामने वाला किस धर्म, जाति या राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा है।

आपदा में पीड़ित व्यक्ति सबसे पहले सहायता का हकदार है—उसकी पहचान बाद में आती है।

6. आम नागरिक क्या कर सकता है?

कई लोग सोचते हैं कि चक्रवात जैसी बड़ी आपदा में हम सामान्य नागरिक आखिर कर ही क्या सकते हैं।

लेकिन छोटे और जिम्मेदार कदम भी महत्वपूर्ण होते हैं।

सबसे पहले, मौसम और सुरक्षा संबंधी जानकारी केवल विश्वसनीय सरकारी स्रोतों से लें।

अगर आप प्रभावित क्षेत्र में रहते हैं, तो स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें।

मछुआरे और नाविक समुद्र में जाने से संबंधित आधिकारिक चेतावनियों को गंभीरता से लें।

आवश्यक दवाएँ, पहचान पत्र, पीने का पानी, जरूरी दस्तावेज और फोन चार्ज रखने जैसी छोटी तैयारियाँ उपयोगी हो सकती हैं।

बुजुर्गों, बच्चों और ऐसे पड़ोसियों का ध्यान रखें जिन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुँचने में सहायता की जरूरत हो सकती है।

किसी अपुष्ट संदेश या पुराने वीडियो को देखकर घबराहट न फैलाएँ।

और यदि राहत में मदद करना चाहते हैं, तो संबंधित प्रशासन या विश्वसनीय राहत संगठनों के माध्यम से सहायता करें।

ध्यान रखें कि तेज हवाओं के दौरान बिजली के तारों, पेड़ों और कमजोर इमारतों के पास जाना जोखिम भरा हो सकता है।

संकट में समझदारी भी सेवा है, और अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना भी जिम्मेदारी है।

7. राजनीति से ऊपर उठकर पीड़ितों के बारे में सोचिए

किसी बड़ी आपदा के समय राजनीतिक बहसें भी शुरू हो सकती हैं।

कोई पूछेगा कि तैयारी पर्याप्त थी या नहीं।

कोई राहत कार्यों की आलोचना करेगा।

कोई सरकार की तारीफ करेगा।

और कोई प्रशासन की कमियों पर सवाल उठाएगा।

इनमें से कई सवाल जरूरी भी हो सकते हैं।

लेकिन आपदा के बीच सबसे पहले हमारी प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?

लोगों को सुरक्षित निकालना।

घायलों को उपचार देना।

जरूरतमंदों तक भोजन और पानी पहुँचाना।

और प्रभावित परिवारों को आश्रय उपलब्ध कराना।

उसके बाद सरकार और प्रशासन की तैयारियों की समीक्षा होनी चाहिए। जहाँ कमी हो, वहाँ सुधार किया जाना चाहिए और यदि लापरवाही सामने आए, तो तथ्यों के आधार पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

संकट में सेवा पहले, राजनीति बाद में—और संकट के बाद जवाबदेही से कोई समझौता नहीं।

मेरे विचार से यही संतुलित दृष्टिकोण है।

8. तूफान के बाद असली चुनौती शुरू होती है

जब चक्रवात आगे बढ़ जाएगा और मौसम धीरे-धीरे सामान्य होगा, तो बहुत से लोग अपने घरों की ओर लौटना चाहेंगे।

लेकिन हर परिवार के लिए स्थिति एक जैसी नहीं होगी।

किसी का घर क्षतिग्रस्त हो सकता है।

किसी की फसल बर्बाद हो सकती है।

किसी की नाव टूट सकती है।

किसी की दुकान या छोटा व्यवसाय बंद हो सकता है।

और किसी परिवार के सामने आने वाले कई महीनों की आर्थिक चुनौती खड़ी हो सकती है।

इसलिए राहत का अर्थ केवल तूफान के दौरान सुरक्षा देना नहीं है।

पुनर्वास भी उतना ही जरूरी है।

प्रभावित लोगों को सहायता कैसे मिलेगी?

क्षतिग्रस्त घरों और सार्वजनिक सुविधाओं की मरम्मत कैसे होगी?

किसानों, मछुआरों और छोटे व्यापारियों को दोबारा काम शुरू करने में कैसे सहायता मिलेगी?

बच्चों की पढ़ाई फिर से सामान्य कैसे होगी?

और अगली आपदा से बचने के लिए कमजोर बुनियादी ढाँचे को कैसे मजबूत किया जाएगा?

इन सवालों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।

आपदा प्रबंधन की सफलता केवल इस बात में नहीं कि कितने लोगों को सुरक्षित निकाला गया, बल्कि इसमें भी है कि प्रभावित परिवार कितनी जल्दी सम्मान के साथ अपना जीवन फिर से शुरू कर सके।

अंत में, मेरी बात बस इतनी है…

चक्रवात अर्नब हमें एक बार फिर याद दिलाता है कि जीवन कितना अनमोल है और मुश्किल समय में तैयारी, धैर्य तथा एकजुटता कितनी जरूरी हैं।

मौसम का पूर्वानुमान हमें चेतावनी देता है।

प्रशासन लोगों को सुरक्षित रखने की तैयारी करता है।

राहतकर्मी अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं।

और आम नागरिक भी सावधानी, सहयोग तथा जिम्मेदारी से इस प्रयास को मजबूत बना सकते हैं।

मैं प्रार्थना करता हूँ कि आंध्र प्रदेश, ओडिशा और अन्य प्रभावित क्षेत्रों के लोग सुरक्षित रहें।

जो परिवार अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जा रहे हैं, उन्हें उचित सहायता मिले।

राहत एवं बचाव कार्यों में लगे कर्मचारियों को सफलता मिले।

और इस आपदा के बाद पुनर्वास तथा पुनर्निर्माण के लिए भी पर्याप्त प्रयास किए जाएँ।

आज के इस संकट में मेरी सबसे बड़ी बात यही है—

इंसानियत से बड़ा कोई राजनीतिक नारा नहीं, और किसी की जान बचाने से बड़ी कोई सेवा नहीं।

मंदिर में पूजा करना श्रद्धा है।

जरूरतमंद की सहायता करना भी एक सुंदर मानवीय कर्तव्य है।

अपने देश से प्रेम करना गौरव की बात है।

अपने देशवासियों के संकट में उनके साथ खड़ा होना उस प्रेम को कर्म में बदलना है।

आइए, प्रार्थना करें कि प्रकृति का यह प्रकोप कम से कम नुकसान पहुँचाए और सभी लोग सुरक्षित रहें।

🙏 सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।

🚩 जय श्री राम!

🇮🇳 भारत माता की जय!

— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
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Saturday, October 24, 2026

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शरद पूर्णिमा: खीर तो हर घर में बनेगी, लेकिन क्या हम अपनी परंपराओं का अर्थ भी जानते हैं?

 

शरद पूर्णिमा: खीर तो हर घर में बनेगी, लेकिन क्या हम अपनी परंपराओं का अर्थ भी जानते हैं?

चाँदनी रात, माँ लक्ष्मी की पूजा और हमारी सनातन संस्कृति का एक अनमोल संदेश

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारी सनातन संस्कृति के लिए…

🌕 जय श्री कृष्ण! जय माँ लक्ष्मी! 🙏

कल शरद पूर्णिमा है।

घर में खीर बनेगी। शाम को चाँद निकलेगा। कहीं माँ लक्ष्मी की पूजा होगी, कहीं भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला का स्मरण किया जाएगा और कहीं परिवार के लोग एक साथ बैठकर इस खूबसूरत रात का आनंद लेंगे।

बचपन से हम ऐसी परंपराएँ देखते आए हैं।

घर के बड़े बताते थे कि शरद पूर्णिमा की रात खीर को चाँदनी में रखा जाता है। कहीं इसे अमृतमयी चाँदनी से जुड़ी धार्मिक मान्यता के रूप में समझाया जाता है, तो कहीं माँ लक्ष्मी की कृपा और समृद्धि की कामना के साथ यह परंपरा निभाई जाती है।

हमने भी देखा, सीखा और धीरे-धीरे यही सब हमारी संस्कृति का हिस्सा बन गया।

लेकिन आज मन में एक सवाल आया—

क्या हम केवल अपने बड़ों की परंपराएँ निभा रहे हैं, या उनके पीछे छिपे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को समझने का प्रयास भी कर रहे हैं?

क्योंकि मेरे विचार से अपनी संस्कृति पर गर्व करना अच्छी बात है, लेकिन उसे समझना, उसके बारे में जानना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।

आइए, आज शरद पूर्णिमा के बहाने इसी विषय पर बात करते हैं।

1. शरद पूर्णिमा केवल खीर और चाँदनी का त्योहार नहीं है

हमारे सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है।

इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा जैसे नामों से भी जाना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व की पूजा-पद्धति और परंपराओं में कुछ अंतर हो सकता है।

कहीं माँ लक्ष्मी की पूजा होती है।

कहीं भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला का स्मरण किया जाता है।

कहीं रात में खीर बनाकर चाँदनी में रखने की परंपरा निभाई जाती है।

और कहीं परिवार के लोग पूरी रात जागकर भजन, कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं।

इस वर्ष शरद पूर्णिमा रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी। इस पर्व की तिथि और परंपराओं के बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं।

लेकिन एक बात सोचिए।

अगर हम किसी त्योहार को केवल उसके बाहरी आयोजन तक सीमित कर दें, तो क्या हम उसकी पूरी सुंदरता को समझ पाएँगे?

मेरे विचार से नहीं।

त्योहारों की असली खूबसूरती केवल पकवान, सजावट और उत्सव में नहीं होती। उनमें परिवार की स्मृतियाँ, धार्मिक विश्वास, सामूहिकता और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएँ भी जुड़ी होती हैं।

शरद पूर्णिमा हमें अपनी परंपराओं से जुड़ने और उनके अर्थ को समझने का एक सुंदर अवसर देती है।

2. चाँदनी में खीर रखने की परंपरा आखिर क्यों है?

यह सवाल बहुत लोगों के मन में आता है।

शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर चाँदनी में रखने की परंपरा क्यों है?

हमारे घरों में इसके बारे में अलग-अलग मान्यताएँ सुनने को मिलती हैं।

लोकविश्वास के अनुसार, इस पूर्णिमा की चाँदनी विशेष और अमृतमयी मानी जाती है। इसी विश्वास के कारण खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

लेकिन यहाँ एक बात समझना जरूरी है।

यह हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता है। चाँदनी में रखी खीर के विशेष स्वास्थ्य लाभ या उसमें अमृत जैसे गुण पैदा होने की बात को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं मानना चाहिए।

धार्मिक परंपराओं को श्रद्धा के साथ समझना और वैज्ञानिक दावों को प्रमाण के आधार पर परखना—दोनों साथ-साथ संभव हैं।

मेरे लिए इस परंपरा का एक भावनात्मक पहलू भी है।

कल्पना कीजिए, घर के सभी लोग एक साथ बैठे हैं। खीर तैयार हो रही है। बच्चे चाँद निकलने का इंतजार कर रहे हैं। घर के बड़े पूजा की तैयारी कर रहे हैं।

ऐसे अवसर परिवार को एक साथ लाते हैं।

एक ही परंपरा से जुड़ी अलग-अलग पीढ़ियों की यादें बनती हैं।

कभी-कभी किसी परंपरा की खूबसूरती केवल उसके अनुष्ठान में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में भी होती है जिन्हें वह करीब लाती है।

3. माँ लक्ष्मी की पूजा और समृद्धि का सही अर्थ

शरद पूर्णिमा पर अनेक परिवार माँ लक्ष्मी की पूजा करते हैं।

माँ लक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी के रूप में पूजा जाता है।

हर परिवार चाहता है कि घर में सुख-शांति रहे, आर्थिक स्थिति अच्छी हो और जीवन में खुशहाली आए।

लेकिन मेरे मन में एक सवाल है—

क्या समृद्धि का अर्थ केवल बैंक बैलेंस, मकान, गाड़ी और संपत्ति है?

निश्चित रूप से आर्थिक मजबूती जरूरी है।

परिवार की आवश्यकताएँ पूरी करना जरूरी है।

बच्चों की शिक्षा, माता-पिता की देखभाल और भविष्य के लिए बचत करना भी महत्वपूर्ण है।

लेकिन क्या एक ऐसा घर, जहाँ बहुत धन हो और आपसी प्रेम न हो, वास्तव में समृद्ध कहा जा सकता है?

क्या उस परिवार को खुशहाल कहा जा सकता है जहाँ एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एक-दूसरे से बात करने तक का समय न निकालें?

मेरे विचार से समृद्धि का एक व्यापक अर्थ भी है।

घर में सम्मान हो।

परिवार में विश्वास हो।

कमाई ईमानदारी से हो।

बुजुर्गों की देखभाल हो।

बच्चों को अच्छे संस्कार मिलें।

और धन का उपयोग केवल व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर दूसरों की सहायता के लिए भी किया जा सके।

माँ लक्ष्मी की पूजा करते समय केवल धन की कामना ही नहीं, बल्कि धन के सदुपयोग और जीवन में संतुलन की प्रेरणा पर भी विचार करना चाहिए।

4. दादी-नानी की परंपराएँ और आज की पीढ़ी

मुझे लगता है कि हमारी पीढ़ी के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

हम तेजी से आधुनिक होते जा रहे हैं।

मोबाइल हमारे हाथ में है।

बच्चे इंटरनेट के साथ बड़े हो रहे हैं।

जानकारी के अनेक साधन उपलब्ध हैं।

दुनिया के किसी भी कोने में क्या हो रहा है, हम कुछ सेकंड में जान सकते हैं।

यह अच्छी बात है।

लेकिन क्या इसी तेजी में हम अपनी छोटी-छोटी पारिवारिक परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं?

पहले घर में त्योहारों की तैयारी कई दिन पहले शुरू होती थी।

दादी या नानी किसी पूजा की कहानी सुनाती थीं।

माँ रसोई में विशेष पकवान बनाती थीं।

बच्चे घर के बड़ों के साथ बैठकर परंपराओं को देखते और सीखते थे।

आज जीवन की गति बदल गई है।

कई परिवारों में काम का दबाव है। लोग अलग-अलग शहरों में रहते हैं। त्योहारों पर भी सभी का एक साथ होना हमेशा संभव नहीं होता।

लेकिन क्या हम अपनी व्यस्त जिंदगी में से थोड़ा समय निकालकर इन परंपराओं को जीवित नहीं रख सकते?

बच्चों को बता सकते हैं कि शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?

उनके साथ खीर बना सकते हैं?

उन्हें माँ लक्ष्मी की पूजा की पारिवारिक परंपरा के बारे में बता सकते हैं?

या परिवार के किसी बुजुर्ग से पूछ सकते हैं कि उनके बचपन में यह त्योहार कैसे मनाया जाता था?

इसके लिए किसी बड़े आयोजन की आवश्यकता नहीं है।

बस थोड़ी रुचि, थोड़ी बातचीत और थोड़ा समय चाहिए।

संस्कृति केवल किताबों में लिखी हुई बात नहीं है। संस्कृति वह भी है जिसे एक पीढ़ी अपने अनुभवों के माध्यम से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती है।

5. सनातन पर गर्व करना अच्छी बात है, लेकिन उसे समझना भी जरूरी है

मैं सनातनी हिंदू हूँ और अपनी संस्कृति पर गर्व करता हूँ।

मुझे अपनी पूजा-पद्धतियों, मंदिरों, त्योहारों और धार्मिक परंपराओं से जुड़ाव महसूस होता है।

लेकिन मेरे विचार से अपनी संस्कृति पर गर्व करने का अर्थ केवल उसके बारे में बड़े-बड़े शब्द बोलना नहीं है।

अपनी परंपराओं को जानना भी जरूरी है।

यह समझना जरूरी है कि कोई त्योहार क्यों मनाया जाता है।

उससे कौन-सी धार्मिक मान्यताएँ जुड़ी हैं।

उसका हमारे परिवार और समाज में क्या स्थान है।

और हम उससे क्या सीख सकते हैं।

अगर हम केवल एक-दूसरे को त्योहार की शुभकामनाएँ भेजें, लेकिन अपने बच्चों को उस पर्व का अर्थ ही न बताएँ, तो हमारी अगली पीढ़ी के लिए इन परंपराओं का महत्व धीरे-धीरे कम हो सकता है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति को हर धार्मिक कथा या रीति का पूरा ज्ञान होना ही चाहिए।

सीखने की शुरुआत कभी भी की जा सकती है।

सनातन से जुड़ने का एक अच्छा तरीका यह भी है कि हम अपनी परंपराओं के बारे में सीखना जारी रखें और अगली पीढ़ी को प्रश्न पूछने तथा समझने के लिए प्रोत्साहित करें।

क्योंकि जिस संस्कृति को हम समझते हैं, उसके प्रति हमारा जुड़ाव भी अधिक सार्थक हो सकता है।

6. त्योहार केवल पूजा नहीं, परिवार को जोड़ने का अवसर भी हैं

आज के समय में एक बड़ी समस्या है—समय की कमी।

पिता काम में व्यस्त हैं।

माँ घर और नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बना रही हैं।

बच्चे स्कूल, पढ़ाई, मोबाइल और अपनी गतिविधियों में व्यस्त हैं।

कई बार परिवार के सदस्य एक साथ रहते हुए भी एक-दूसरे को पर्याप्त समय नहीं दे पाते।

ऐसे में त्योहार हमें एक अवसर देते हैं।

एक साथ बैठने का।

परिवार की कहानियाँ सुनने का।

बचपन की यादें साझा करने का।

घर के बड़ों से सीखने का।

और यह महसूस करने का कि परिवार का महत्व केवल जिम्मेदारियाँ निभाने में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ समय बिताने में भी है।

शरद पूर्णिमा की रात अगर पूरा परिवार एक साथ बैठकर खीर खाए, कुछ देर बातचीत करे और एक-दूसरे के अनुभव सुने, तो यह भी एक सुंदर परंपरा बन सकती है।

हमारी सांस्कृतिक विरासत केवल अनुष्ठानों में नहीं, इन छोटे-छोटे अनुभवों में भी जीवित रहती है।

7. अपनी परंपरा निभाइए, लेकिन समझ और जिम्मेदारी के साथ

मुझे लगता है कि धार्मिक परंपराओं के बारे में दो बातों का ध्यान रखना चाहिए।

पहली, अपनी श्रद्धा का सम्मान कीजिए।

अगर आपके परिवार में शरद पूर्णिमा पर खीर बनती है, तो उस परंपरा को आनंद से निभाइए।

अगर आप माँ लक्ष्मी की पूजा करते हैं, तो श्रद्धा के साथ कीजिए।

अगर आप श्रीकृष्ण की महारास लीला का स्मरण करते हैं, तो उसके धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के बारे में जानने का प्रयास कीजिए।

दूसरी बात, अपनी मान्यताओं को समझते हुए दूसरों की परंपराओं का भी सम्मान कीजिए।

हर परिवार की पूजा-पद्धति एक जैसी नहीं होती।

हर व्यक्ति धार्मिक परंपराओं को एक ही तरीके से नहीं निभाता।

इसलिए अपनी परंपरा पर गर्व करने के लिए किसी दूसरे को कमतर समझने की जरूरत नहीं है।

अपनी संस्कृति का सम्मान कीजिए, उसे समझिए और उसे अपने जीवन में स्थान दीजिए—यही उससे जुड़ाव का सार्थक तरीका है।

8. इस शरद पूर्णिमा पर मेरा छोटा-सा संकल्प

इस बार शरद पूर्णिमा पर मैं अपने लिए एक छोटा-सा संकल्प रखना चाहता हूँ।

मैं अपनी परंपराओं को केवल इसलिए नहीं निभाऊँगा कि वे वर्षों से चली आ रही हैं।

मैं उनके बारे में जानने और समझने का प्रयास भी करूँगा।

मैं अपने परिवार की पुरानी यादों और अनुभवों को महत्व दूँगा।

मैं अगली पीढ़ी को अपनी संस्कृति के बारे में बताने का प्रयास करूँगा।

मैं धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करूँगा, लेकिन किसी वैज्ञानिक दावे को बिना प्रमाण के तथ्य नहीं मानूँगा।

और सबसे महत्वपूर्ण, मैं यह याद रखूँगा कि अपनी संस्कृति से प्रेम करना उसे समझने और जीवित रखने की जिम्मेदारी भी है।

ये बातें किसी को उपदेश देने के लिए नहीं हैं।

ये स्वयं को याद दिलाने वाली बातें हैं।

क्योंकि किसी भी परंपरा को जीवित रखने की शुरुआत अपने घर से हो सकती है।

अंत में, मेरी बात बस इतनी है…

कल शरद पूर्णिमा है।

चाँदनी होगी।

खीर बनेगी।

माँ लक्ष्मी की पूजा होगी।

कहीं भजन होंगे, कहीं श्रीकृष्ण की महारास लीला का स्मरण होगा और कहीं परिवार के लोग एक साथ बैठकर इस रात का आनंद लेंगे।

मैं चाहता हूँ कि हम इन परंपराओं को श्रद्धा के साथ निभाएँ।

लेकिन साथ ही उनके अर्थ को समझने का प्रयास भी करें।

अपने बच्चों को केवल यह न बताएँ कि शरद पूर्णिमा पर खीर बनती है।

उन्हें यह भी बताइए कि यह हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है।

उन्हें अपने परिवार की कहानियाँ सुनाइए।

उन्हें अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर दीजिए।

और उन्हें यह समझने दीजिए कि आधुनिकता अपनाने और अपनी संस्कृति से जुड़े रहने में कोई विरोधाभास नहीं है।

क्योंकि—

चाँदनी में खीर रखना एक परंपरा है, लेकिन अपनी संस्कृति का अर्थ समझकर उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य है।

शायद किसी दिन हमारे बच्चे भी अपने बच्चों को शरद पूर्णिमा की कहानी सुनाएँगे।

वे भी खीर बनाएँगे, चाँद को देखेंगे और अपने परिवार की परंपराओं को याद करेंगे।

और उस दिन हमें महसूस होगा कि हमने केवल एक त्योहार नहीं मनाया था।

हमने अपनी विरासत को आगे बढ़ाया था।

🌕 आप सभी को शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ!

🙏 जय माँ लक्ष्मी!

🦚 जय श्री कृष्ण!

🚩 जय श्री राम!

— देव वैदिक
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Friday, October 23, 2026

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एक अफवाह, भगदड़ और 19 मौतें… माँ के दरबार में आखिर ऐसा क्यों हुआ?

दुर्गा पूजा हादसा: श्रद्धा के साथ सुरक्षा और जिम्मेदारी भी जरूरी है

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मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारी सनातन संस्कृति के लिए…

🚩 जय माता दी! 🙏

आज मन बहुत व्यथित है।

कोलकाता की दुर्गा पूजा के दौरान हुई भगदड़ की खबर ने एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि धार्मिक आयोजनों में श्रद्धा के साथ जिम्मेदारी कितनी जरूरी है।

कोई माँ दुर्गा के दर्शन करने आया था।

कोई अपने परिवार के साथ पूजा देखने निकला था।

कोई अपने बच्चों को माँ का दरबार दिखाना चाहता था।

किसी ने मन्नत माँगी होगी, किसी ने अपने परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना की होगी।

लेकिन 17 अक्टूबर को कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में ऐसा हादसा हुआ, जिसमें 19 लोगों की मृत्यु हो गई और 25 लोग घायल हुए।

और अब इस मामले की जाँच के दौरान सामने आ रही जानकारियाँ कई गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

माँ के दर्शन करने निकले श्रद्धालुओं को क्या पता था कि उनका यह सफर इतनी बड़ी त्रासदी में बदल जाएगा?

यह केवल एक समाचार नहीं है।

यह उन परिवारों का दर्द है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया।

यह उन लोगों की पीड़ा है, जो घायल हुए।

और यह हम सभी के लिए एक चेतावनी है कि धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को कभी हल्के में नहीं लिया जा सकता।

1. आखिर उस शाम हुआ क्या था?

कोलकाता के उत्तरी हिस्से में स्थित चोरबागान सर्वजनिन दुर्गा पूजा पंडाल में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचे थे।

17 अक्टूबर की शाम भीड़, बारिश और पंडाल के आसपास की व्यवस्था के बीच स्थिति बिगड़ गई और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हुई।

The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, घटनास्थल के आसपास संकरी गलियाँ थीं और पंडाल में केवल एक निकास द्वार होने की बात सामने आई। रिपोर्ट में भीड़ नियंत्रण, स्वयंसेवकों के अनुभव और समय पर की गई घोषणाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए। जरा सोचिए।

जब हजारों लोग एक साथ किसी धार्मिक स्थल पर मौजूद हों, तो किसी भी अचानक पैदा हुई स्थिति को सँभालना बेहद कठिन हो सकता है।

लोगों को बाहर निकलने का रास्ता चाहिए।

सुरक्षा कर्मचारियों को स्पष्ट जानकारी चाहिए।

आयोजकों को भीड़ की स्थिति समझनी चाहिए।

और प्रशासन को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि किसी भी आपातकालीन परिस्थिति में लोगों की जान जोखिम में न पड़े।

लेकिन अगर भीड़ बहुत बढ़ जाए, रास्ते सीमित हों और लोगों के बीच घबराहट फैल जाए, तो स्थिति कुछ ही क्षणों में नियंत्रण से बाहर जा सकती है।

भीड़ में खतरा केवल लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि अव्यवस्था और अचानक पैदा होने वाली घबराहट से भी बढ़ता है।

2. एक घोषणा… और लोगों के मन में डर!

इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू उस घोषणा से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर कहा गया कि पंडाल का एक हिस्सा गिरने वाला है और लोगों को तुरंत बाहर निकलना चाहिए।

23 अक्टूबर की PTI रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने दो और लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया है। पुलिस का आरोप है कि दोनों ने पंडाल गिरने संबंधी घोषणाएँ की थीं, जिनसे लोगों में अफरा-तफरी फैलने की आशंका है। सीसीटीवी फुटेज की जाँच के आधार पर उनकी पहचान किए जाने की जानकारी भी दी गई है। यहाँ एक जरूरी बात समझिए।

इन गिरफ्तारियों का अर्थ यह नहीं है कि पूरे हादसे की जिम्मेदारी अदालत ने तय कर दी है। मामले की जाँच चल रही है और अंतिम जिम्मेदारी तथ्यों तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही तय होनी चाहिए।

लेकिन इस घटनाक्रम से एक गंभीर सवाल जरूर उठता है।

अगर किसी बड़े आयोजन में बिना पुष्टि के यह सूचना फैल जाए कि कोई संरचना गिरने वाली है, तो उसका असर कितना खतरनाक हो सकता है?

एक व्यक्ति घबराता है।

दूसरा उसे देखकर घबराता है।

फिर कोई अपने बच्चे को उठाकर बाहर निकलने की कोशिश करता है।

कोई बुजुर्ग को सँभालता है।

और कोई यह जाने बिना भागने लगता है कि वास्तविक खतरा कहाँ है।

भीड़ में जब लोग एक साथ तेजी से किसी संकरे रास्ते की ओर बढ़ते हैं, तो दूसरों को सँभालने का अवसर बहुत कम रह जाता है।

इसलिए किसी सार्वजनिक आयोजन में दी जाने वाली सूचना का स्पष्ट, सही और जिम्मेदार होना बहुत महत्वपूर्ण है।

सूचना देने वाले के लिए यह कुछ शब्द हो सकते हैं, लेकिन सुनने वालों के लिए जीवन-मृत्यु का सवाल बन सकता है।

3. क्या यह केवल अफवाह का मामला है?

मेरे विचार से हमें इस सवाल को थोड़ा व्यापक रूप में देखना चाहिए।

पुलिस ने कथित घोषणाओं के संबंध में गिरफ्तारियाँ की हैं। लेकिन घटना के पीछे कौन-कौन से कारण थे, किसकी क्या भूमिका थी और क्या व्यवस्थागत चूक हुई—इन सभी बातों की जाँच जरूरी है।

मीडिया रिपोर्टों में संकरे रास्तों, सीमित निकास, भारी भीड़, बारिश और भीड़ नियंत्रण से जुड़ी समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है। 

इसलिए पूरी त्रासदी को केवल एक अफवाह से जोड़ देना जल्दबाजी होगी।

हमें यह भी पूछना चाहिए—

क्या पंडाल की सुरक्षित क्षमता का सही आकलन किया गया था?

क्या प्रवेश और निकास की व्यवस्था पर्याप्त थी?

क्या आयोजकों को भीड़ की स्थिति का वास्तविक समय में पता चल रहा था?

क्या सुरक्षा कर्मचारियों और स्वयंसेवकों को आपातकालीन स्थिति सँभालने का प्रशिक्षण था?

क्या प्रशासन और आयोजकों के बीच उचित समन्वय था?

और क्या किसी संभावित खतरे की सूचना मिलने पर उसे सत्यापित करने तथा लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की स्पष्ट योजना थी?

इन सवालों के जवाब ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने में मदद कर सकते हैं।

अफवाह फैलाने वाला जिम्मेदार हो सकता है, लेकिन भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा की व्यवस्था की जाँच भी उतनी ही जरूरी है।

न्याय का अर्थ केवल किसी एक व्यक्ति को पकड़ लेना नहीं है।

न्याय का अर्थ है वास्तविक कारणों को सामने लाना, जिम्मेदारी तय करना और ऐसी व्यवस्था बनाना कि वही गलती दोबारा न हो।

4. माँ के दरबार में श्रद्धा जरूरी है, लेकिन सुरक्षा भी

मैं सनातनी हिंदू हूँ और अपनी संस्कृति पर गर्व करता हूँ।

दुर्गा पूजा, नवरात्रि, मंदिरों के उत्सव और धार्मिक मेले हमारे सामाजिक तथा आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इन आयोजनों से लोगों को श्रद्धा, आनंद और सामूहिकता का अनुभव मिलता है।

लोग परिवारों के साथ आते हैं।

बच्चे हमारी परंपराओं को देखते हैं।

कलाकार अपनी कला प्रस्तुत करते हैं।

स्वयंसेवक सेवा करते हैं।

समाज एक साथ उत्सव मनाता है।

लेकिन इन सबके बीच एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए—

धार्मिक आयोजन की भव्यता से ज्यादा महत्वपूर्ण उसमें आने वाले लोगों का जीवन है।

पंडाल कितना सुंदर है, रोशनी कितनी आकर्षक है, माँ की प्रतिमा कितनी भव्य है और कितनी बड़ी भीड़ आई—ये सब आयोजन का हिस्सा हैं।

लेकिन सुरक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन भी उतनी ही गंभीरता से होना चाहिए।

क्या पर्याप्त निकास द्वार हैं?

क्या आपातकालीन वाहन वहाँ तक पहुँच सकते हैं?

क्या प्रवेश नियंत्रित किया जा रहा है?

क्या स्वयंसेवकों को पता है कि घबराहट पैदा होने पर क्या करना है?

क्या घोषणाएँ स्पष्ट और भरोसेमंद हैं?

क्या बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांग श्रद्धालुओं की सुरक्षा का ध्यान रखा गया है?

इन सवालों का जवाब पहले से तैयार होना चाहिए।

माँ का दरबार भव्य हो, लेकिन वहाँ आने वाला हर श्रद्धालु सुरक्षित घर लौटे—यह उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।

5. प्रशासन और आयोजकों को क्या करना चाहिए?

यहाँ केवल शोक व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है।

हमें यह भी सोचना चाहिए कि आगे क्या किया जा सकता है।

मेरे विचार से हर बड़े धार्मिक आयोजन में कुछ बुनियादी व्यवस्थाएँ अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।

पहला—भीड़ की क्षमता तय हो।

किसी भी पंडाल या आयोजन स्थल में क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश न दिया जाए। भीड़ बढ़ने पर प्रवेश को नियंत्रित करने की व्यवस्था हो।

दूसरा—निकास मार्ग पर्याप्त और खुले हों।

प्रवेश और निकास को स्पष्ट रूप से अलग रखना उपयोगी हो सकता है। किसी भी स्थिति में लोगों के निकलने के रास्ते अवरुद्ध नहीं होने चाहिए।

तीसरा—हर घोषणा की जिम्मेदारी तय हो।

माइक से सूचना देने वाले प्रशिक्षित और अधिकृत व्यक्ति हों। यदि किसी खतरे की सूचना मिले, तो उसे संबंधित सुरक्षा टीम से तत्काल सत्यापित करने की व्यवस्था हो।

चौथा—आपातकालीन योजना पहले से तैयार हो।

बारिश, बिजली की खराबी, आग या अचानक भीड़ बढ़ने जैसी परिस्थितियों में क्या करना है, यह आयोजकों, पुलिस और स्वयंसेवकों को पता होना चाहिए।

पाँचवाँ—प्रशासन और आयोजकों के बीच समन्वय हो।

सिर्फ आयोजन शुरू होने से पहले अनुमति मिल जाना पर्याप्त नहीं है। भीड़ की वास्तविक स्थिति के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा भी आवश्यक है।

इन उपायों से हर जोखिम समाप्त नहीं हो सकता, लेकिन उचित तैयारी से दुर्घटना की आशंका और गंभीरता कम करने में सहायता मिल सकती है।

6. सोशल मीडिया और अफवाहों की जिम्मेदारी

आज सूचना फैलने में कुछ ही सेकंड लगते हैं।

एक वीडियो रिकॉर्ड हुआ।

किसी ने एक संदेश लिख दिया।

फिर वह WhatsApp समूहों और सोशल मीडिया पर फैलने लगा।

लोग उसे पढ़े बिना आगे भेजने लगते हैं।

लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि किसी संवेदनशील परिस्थिति में हमारी एक गलत पोस्ट भी लोगों में घबराहट फैला सकती है?

यदि किसी धार्मिक स्थल पर कोई खतरे की खबर मिले, तो सबसे पहले उसकी पुष्टि करना और आधिकारिक सुरक्षा निर्देशों पर ध्यान देना चाहिए।

बिना पुष्टि के संदेश आगे भेजना उचित नहीं है।

और यदि वास्तव में खतरा मौजूद हो, तो भीड़ की दिशा में भागने या दूसरों को धक्का देने के बजाय प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों के निर्देशों का पालन करना चाहिए।

अगर किसी जगह भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो जाए, तो परिवार और बच्चों को सुरक्षित रखने का प्रयास करें, धक्का-मुक्की से बचें और उपलब्ध सुरक्षित निकास की ओर व्यवस्थित तरीके से बढ़ें।

मोबाइल पर कोई संदेश साझा करना आसान है, लेकिन उस संदेश के परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं।

हर नागरिक को यह जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

7. राजनीति से ऊपर उठकर पीड़ित परिवारों को देखिए

किसी बड़ी दुर्घटना के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाना कोई नई बात नहीं है।

कोई सरकार पर सवाल उठाता है।

कोई प्रशासन को जिम्मेदार बताता है।

कोई आयोजन समिति की आलोचना करता है।

और कोई घटना को अपने राजनीतिक तर्क के समर्थन में इस्तेमाल करने लगता है।

जवाबदेही माँगना गलत नहीं है। यदि लापरवाही हुई है, तो उसकी जाँच और कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन इस पूरी बहस में उन परिवारों को नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने अपने प्रियजन खोए हैं।

उनके लिए यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है।

उनके लिए यह जीवन का ऐसा दुःख है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

इसलिए मेरी राय है कि सबसे पहले पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता होनी चाहिए।

घायलों को उचित उपचार मिले।

परिवारों को सहायता मिले।

जाँच निष्पक्षता से हो।

और जिनकी जिम्मेदारी कानून के अनुसार तय होती है, उनके विरुद्ध उचित कार्रवाई हो।

जवाबदेही जरूरी है, लेकिन किसी की त्रासदी को राजनीतिक तमाशा बना देना उचित नहीं है।

8. सनातन का संदेश: जीवन का सम्मान भी धर्म है

हम माँ दुर्गा की आराधना करते हैं।

उनके साहस और शक्ति का स्मरण करते हैं।

धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष की कथाओं से प्रेरणा लेते हैं।

लेकिन धार्मिक आस्था का एक महत्वपूर्ण पक्ष करुणा और जिम्मेदारी भी है।

किसी संकट में पड़े व्यक्ति की सहायता करना, दूसरों के जीवन का सम्मान करना और समाज को सुरक्षित बनाने का प्रयास करना भी महत्वपूर्ण है।

अगर हमारे धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की सुरक्षा को गंभीरता से लिया जाता है, तो वह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का अच्छा उदाहरण होगा।

अगर आयोजक अपनी कमियों से सीखते हैं, प्रशासन अपनी व्यवस्था बेहतर बनाता है और नागरिक अफवाहों से बचते हैं, तो भविष्य के आयोजन अधिक सुरक्षित बन सकते हैं।

मैं चाहता हूँ कि हमारे धार्मिक उत्सव भव्य भी हों और सुव्यवस्थित भी।

उनमें आस्था भी हो और संवेदनशीलता भी।

परंपराएँ भी जीवित रहें और जीवन की सुरक्षा भी प्राथमिकता बनी रहे।

सनातन की गरिमा केवल भव्य आयोजन में नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी में भी है जिसके साथ हम अपने समाज और उसके लोगों की देखभाल करते हैं।

9. इस घटना से हमें क्या सीखना चाहिए?

कोलकाता की यह दुखद घटना हमें कई महत्वपूर्ण बातें याद दिलाती है।

किसी आयोजन में जोखिम की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

बिना पुष्टि के भय फैलाने वाली सूचना नहीं दी जानी चाहिए।

भीड़ की क्षमता और निकास मार्गों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

प्रशासन और आयोजकों के बीच समन्वय होना चाहिए।

और किसी दुर्घटना के बाद कारणों की निष्पक्ष जाँच कर सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।

यह जिम्मेदारी केवल कोलकाता की नहीं है।

देश के हर शहर में जहाँ बड़े धार्मिक आयोजन होते हैं, वहाँ इन बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

क्योंकि अगला बड़ा आयोजन कहीं भी हो सकता है।

और हम यह नहीं चाहेंगे कि किसी दूसरे परिवार को भी वैसा ही दुःख झेलना पड़े।

दुर्घटना के बाद केवल आँसू बहाना नहीं, उससे सीखकर भविष्य सुरक्षित बनाना भी हमारी जिम्मेदारी है।

अंत में, मेरी बात बस इतनी है…

आज माँ दुर्गा के सामने सिर झुकाते हुए मन में एक ही प्रार्थना है।

जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उन्हें इस दुःख को सहने की शक्ति मिले।

जो लोग घायल हैं, उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य लाभ मिले।

और घटना की जाँच से वास्तविक कारण सामने आएँ, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें।

मुझे उम्मीद है कि इस घटना से आयोजक, प्रशासन और समाज सभी सीख लेंगे।

धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को अतिरिक्त व्यवस्था नहीं, बल्कि आयोजन की मूल आवश्यकता माना जाएगा।

और हम सभी सूचना साझा करने से पहले उसकी सत्यता पर ध्यान देंगे।

क्योंकि अंततः—

माँ के दर्शन करने निकले हर श्रद्धालु का सुरक्षित घर लौटना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना श्रद्धा के साथ माँ के दरबार में पहुँचना।

भक्ति के उत्सव में किसी परिवार का घर उजड़ना नहीं चाहिए।

श्रद्धा के साथ सुरक्षा हो।

उत्सव के साथ जिम्मेदारी हो।

और धर्म के साथ मानव जीवन के प्रति संवेदनशीलता हो।

🙏 जय माता दी!

🚩 जय श्री राम!

— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारी सनातन संस्कृति के लिए…
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Tuesday, October 20, 2026

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रावण का पुतला तो हर साल जलाते हैं… अपने भीतर के रावण का क्या?

दशहरा, सनातन संस्कृति और आज के समाज का एक कड़वा सच
दशहरा, सनातन संस्कृति और आज के समाज का एक कड़वा सच

मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…

🚩 जय श्री राम! 🙏

आज दशहरा है।

शाम को जगह-जगह रावण के पुतले जलाए जाएँगे। मेले लगेंगे, बच्चे खुश होंगे, आतिशबाजी होगी और पूरा वातावरण उत्सव के रंग में रंग जाएगा।

हर तरफ एक ही संदेश सुनाई देगा—

बुराई पर अच्छाई की जीत!

हम भगवान श्रीराम का स्मरण करेंगे। उनकी मर्यादा, उनके साहस और उनके आदर्शों की बातें करेंगे।

लेकिन आज मेरे मन में एक सवाल बार-बार आ रहा है।

रावण तो हर साल जलता है, फिर भी हमारे समाज में अहंकार क्यों नहीं मिटता?

झूठ क्यों नहीं मिटता?

भ्रष्टाचार क्यों नहीं मिटता?

लालच क्यों नहीं मिटता?

और सबसे बड़ी बात—

हम दूसरों की गलतियाँ गिनाने में इतने व्यस्त क्यों रहते हैं कि अपनी कमियाँ देखने का समय ही नहीं निकालते?

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम हर साल रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन अपने भीतर बैठे रावण को बचाकर रखते हैं?

आज इसी पर बात करते हैं।

1. रावण आखिर था कौन?

हम सभी रामायण की कथा जानते हैं।

रावण लंका का राजा था। वह विद्वान था, शक्तिशाली था और अनेक गुणों से संपन्न था। लेकिन उसकी कथा हमें यह भी याद दिलाती है कि ज्ञान, शक्ति और वैभव होने के बावजूद अहंकार और अधर्म के परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।

मेरे विचार से रावण की कथा का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि केवल योग्य होना पर्याप्त नहीं है।

योग्यता के साथ विनम्रता भी चाहिए।

शक्ति के साथ विवेक भी चाहिए।

ज्ञान के साथ मर्यादा भी चाहिए।

और सफलता के साथ अपने कर्तव्यों की समझ भी चाहिए।

क्योंकि जब व्यक्ति अपनी शक्ति और उपलब्धियों के अहंकार में दूसरों की मर्यादा भूलने लगता है, तो उसकी अच्छाइयाँ भी उसके दोषों को छिपा नहीं पातीं।

रावण के पास ज्ञान था, लेकिन ज्ञान के साथ सही आचरण का होना भी आवश्यक है।

यही बात आज हमारे व्यक्तिगत जीवन, समाज और राजनीति पर भी लागू होती है।

2. आज का रावण केवल पुतले में नहीं है

आज हम रावण के दस सिरों की बात करते हैं।

लेकिन जरा अपने आसपास देखिए।

कहीं झूठ है।

कहीं लालच है।

कहीं क्रोध है।

कहीं ईर्ष्या है।

कहीं अहंकार है।

कहीं दूसरे का हक मारने की प्रवृत्ति है।

और कहीं अपनी गलती जानते हुए भी उसे स्वीकार न करने की आदत है।

अब सोचिए, क्या ये सभी बातें केवल दूसरों में दिखाई देती हैं?

क्या हम कभी झूठ नहीं बोलते?

क्या हम कभी अपने फायदे के लिए नियमों को तोड़ने की कोशिश नहीं करते?

क्या हम कभी अपनी गलती का दोष दूसरे पर नहीं डालते?

क्या हम कभी किसी की सफलता से ईर्ष्या नहीं करते?

अगर हम ईमानदारी से अपने भीतर झाँकें, तो शायद हमें कुछ ऐसे जवाब मिलेंगे जिनसे हम स्वयं भी पूरी तरह सहज नहीं होंगे।

लेकिन आत्मचिंतन का उद्देश्य स्वयं को अपमानित करना नहीं है।

उद्देश्य है अपनी कमियों को पहचानना और उन्हें सुधारने का प्रयास करना।

इस दशहरे पर दूसरों के भीतर रावण खोजने से पहले अपने भीतर की किसी एक बुराई को पहचानिए।

शायद यही इस पर्व को अपने जीवन में उतारने की अच्छी शुरुआत होगी।

3. मंदिर में सिर झुकाना आसान है, अहंकार छोड़ना मुश्किल

मैं सनातनी हिंदू हूँ।

मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है। मुझे मंदिर जाना, पूजा-पाठ करना और धार्मिक परंपराओं से जुड़ना अच्छा लगता है।

लेकिन मेरे विचार से धर्म का प्रभाव केवल पूजा के समय तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

अगर हम भगवान श्रीराम का नाम लेते हैं, तो उनके जीवन से मर्यादा और कर्तव्य की प्रेरणा लेने का प्रयास भी करना चाहिए।

अगर हम सत्य की बात करते हैं, तो अपने फायदे के लिए झूठ बोलने से बचना चाहिए।

अगर हम धर्म की रक्षा की बात करते हैं, तो अपने व्यवहार में भी न्याय और ईमानदारी लाने का प्रयास करना चाहिए।

अगर हम समाज में अच्छे संस्कार चाहते हैं, तो अपने घर से शुरुआत करनी चाहिए।

माथे पर तिलक होना अच्छी बात है, लेकिन व्यवहार में विनम्रता भी होनी चाहिए।

धार्मिक पहचान हमारी आस्था का हिस्सा है। उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति का चरित्र केवल उसके पहनावे, पूजा-पद्धति या धार्मिक नारों से तय नहीं किया जा सकता।

उसके कर्म और व्यवहार भी महत्वपूर्ण हैं।

4. अब जरा अपने समाज की बात करें

हम अक्सर कहते हैं कि समाज बदलना चाहिए।

लोगों में नैतिकता होनी चाहिए।

युवाओं में संस्कार होने चाहिए।

परिवारों में सम्मान होना चाहिए।

लेकिन क्या हम अपने आचरण से इन मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास करते हैं?

एक पिता अपने बेटे से ईमानदारी की अपेक्षा करता है, लेकिन अगर वही पिता किसी छोटे-से निजी लाभ के लिए गलत रास्ता अपनाए, तो बच्चा क्या सीखेगा?

एक व्यापारी चाहता है कि ग्राहक उस पर भरोसा करे, लेकिन अगर वह खुद ग्राहक को गलत जानकारी दे, तो उसके संस्कार कहाँ गए?

एक कर्मचारी अपने अधिकारों की बात करता है, लेकिन अगर वह अपनी जिम्मेदारियों से बचता है, तो क्या यह उचित है?

एक व्यक्ति अपने बच्चों से बड़ों का सम्मान करने की अपेक्षा करता है, लेकिन वही व्यक्ति अपने घर के बुजुर्गों की बात सुनने को तैयार नहीं होता।

समाज केवल भाषणों से नहीं बदलता। समाज तब बदलता है जब लोग अपने जीवन में छोटे-छोटे सुधार करना शुरू करते हैं।

हम सभी से गलतियाँ हो सकती हैं।

लेकिन गलती को सही ठहराने के बजाय उसे स्वीकार करना और सुधारना ही महत्वपूर्ण है।

5. राजनीति में भी रावण कहाँ कम हैं?

अब बात राजनीति की भी हो जाए।

क्योंकि दशहरा है और राजनीति हमारे सार्वजनिक जीवन का हिस्सा है।

आजकल हर राजनीतिक दल अपने विरोधी की गलतियाँ गिनाने में लगा रहता है।

कोई कहता है कि सामने वाला भ्रष्ट है।

कोई कहता है कि दूसरा लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है।

कोई खुद को राष्ट्रहित का सबसे बड़ा रक्षक बताता है।

और कोई दावा करता है कि देश को बचाने की जिम्मेदारी केवल उसी की है।

लेकिन मेरे मन में सवाल है—

क्या राजनीति में नैतिकता की परीक्षा केवल विरोधी दल की होती है?

क्या सत्ता में बैठे लोगों को अपने फैसलों की जवाबदेही नहीं निभानी चाहिए?

क्या विपक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण नहीं देने चाहिए?

क्या राजनीतिक दलों को जनता की वास्तविक समस्याओं पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए?

मेरी राजनीतिक सोच BJP के राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के करीब है। मैं अपनी विचारधारा छिपाता नहीं हूँ।

लेकिन मेरे लिए देश किसी राजनीतिक दल से बड़ा है।

अगर सरकार कोई अच्छा काम करती है, तो उसका समर्थन होना चाहिए।

अगर किसी नीतिगत फैसले पर गंभीर सवाल हैं, तो उनका जवाब भी मिलना चाहिए।

अगर विपक्ष सही मुद्दा उठाता है, तो केवल विपक्ष होने के कारण उसे खारिज नहीं करना चाहिए।

और अगर कोई दल सत्ता पाने के लिए समाज में अनावश्यक तनाव बढ़ाता है, तो उसके तौर-तरीकों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

ये बातें केवल किसी एक पार्टी पर लागू नहीं होतीं।

राजनीति में मर्यादा, जवाबदेही और राष्ट्रहित—तीनों जरूरी हैं।

मेरे विचार से लोकतंत्र में असली जीत केवल चुनाव जीतना नहीं है। असली जीत तब है जब जनता का जीवन बेहतर हो, संस्थाओं पर भरोसा बना रहे और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद समाज में संवाद की जगह बची रहे।

6. सनातन का गौरव केवल अतीत में नहीं, हमारे वर्तमान में भी होना चाहिए

हम अपनी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व करते हैं।

करना भी चाहिए।

लेकिन अपने अतीत पर गर्व करने के साथ यह भी देखना होगा कि हम अपने वर्तमान को कैसा बना रहे हैं।

हमारे मंदिर सुंदर हों, लेकिन हमारे सार्वजनिक स्थान भी स्वच्छ हों।

हमारे त्योहार भव्य हों, लेकिन हमारे व्यवहार में भी मर्यादा हो।

हमारे बच्चे रामायण की कथाएँ जानें, लेकिन सत्य बोलने का महत्व भी समझें।

हम धार्मिक आयोजन करें, लेकिन दूसरे लोगों की सुरक्षा और सम्मान का ध्यान भी रखें।

हम अपने राष्ट्र पर गर्व करें, लेकिन अपने नागरिक कर्तव्यों को भी ईमानदारी से निभाएँ।

सनातन पर गर्व करना केवल हमारी विरासत को याद करना नहीं, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर अपने वर्तमान को बेहतर बनाने का प्रयास करना भी है।

हमारी अगली पीढ़ी हमें केवल इस आधार पर याद न करे कि हमने कितने बड़े उत्सव मनाए।

वह यह भी कह सके कि हमने ईमानदारी, संस्कार और जिम्मेदारी का उदाहरण प्रस्तुत किया।

7. अपने भीतर के रावण को पहचानना इतना मुश्किल क्यों है?

क्योंकि दूसरों की गलती हमें जल्दी दिखाई देती है।

हमारे पास दूसरों की आलोचना करने के लिए समय भी है और शब्द भी।

लेकिन जब अपनी बारी आती है, तो हम अक्सर अपने लिए बहाने ढूँढ़ लेते हैं।

हम कहते हैं कि परिस्थिति ऐसी थी।

हम कहते हैं कि सब लोग ऐसा करते हैं।

हम कहते हैं कि मेरे पास दूसरा रास्ता नहीं था।

कभी-कभी परिस्थितियाँ वास्तव में कठिन होती हैं। हर गलती का मूल्यांकन बिना संदर्भ समझे नहीं किया जा सकता।

लेकिन हर बार अपनी जिम्मेदारी से बचना भी उचित नहीं है।

इस दशहरे पर मैं अपने आप से तीन सवाल पूछना चाहता हूँ—

क्या मैं अपनी गलती स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ?

क्या मैं अपने फायदे से ऊपर उठकर सही निर्णय लेने का प्रयास करता हूँ?

क्या मैं अपने व्यवहार में वही मर्यादा रखता हूँ, जिसकी अपेक्षा दूसरों से करता हूँ?

इन सवालों का उत्तर किसी दूसरे को नहीं देना है।

उत्तर स्वयं को देना है।

और अगर जवाब में कोई कमी दिखाई दे, तो उसे सुधारने का प्रयास करना है।

8. इस दशहरे पर एक छोटा-सा संकल्प

इस बार जब आप रावण दहन देखने जाएँ, तो एक पल अपने लिए भी निकालिए।

अपने भीतर की किसी एक बुराई को पहचानिए।

हो सकता है वह क्रोध हो।

हो सकता है अहंकार हो।

हो सकता है काम को टालते रहने की आदत हो।

हो सकता है किसी के प्रति मन में बैठी कटुता हो।

या फिर अपनी गलती स्वीकार न करने की प्रवृत्ति हो।

फिर स्वयं से एक छोटा-सा वादा कीजिए।

इस दशहरे पर मैं अपनी इस एक कमी को सुधारने की दिशा में कदम उठाऊँगा।

जरूरी नहीं कि एक दिन में पूरा बदलाव आ जाए।

लेकिन शुरुआत तो हो सकती है।

हर दिन थोड़ा बेहतर बनने का प्रयास किया जा सकता है।

यही संकल्प आगे चलकर हमारे परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

अंत में, मेरी बात बस इतनी है…

आज रावण के पुतले जलेंगे।

आतिशबाजी होगी।

लोग एक-दूसरे को दशहरे की शुभकामनाएँ देंगे।

और फिर हम अपने रोजमर्रा के जीवन में लौट जाएँगे।

लेकिन मैं चाहता हूँ कि इस दशहरे का संदेश केवल शाम तक सीमित न रहे।

जब हम भगवान श्रीराम का स्मरण करें, तो उनके आदर्शों को भी याद रखें।

जब बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाएँ, तो अपने भीतर की किसी बुराई को कम करने का प्रयास भी करें।

जब हम समाज में बदलाव की बात करें, तो अपने घर और अपने व्यवहार से शुरुआत करें।

और जब हम राजनीति में नैतिकता की अपेक्षा करें, तो सभी दलों के लिए एक ही कसौटी रखें।

क्योंकि—

रावण का पुतला जलाना एक परंपरा है, लेकिन अपने भीतर के अहंकार, लालच और अन्याय को पहचानकर सुधारने का प्रयास करना उस परंपरा को जीवन में उतारना है।

भगवान श्रीराम से मेरी प्रार्थना है कि हमें सत्य के मार्ग पर चलने, अपने कर्तव्यों को निभाने और अपनी गलतियों को स्वीकार करने की शक्ति मिले।

हम अपने परिवार के लिए बेहतर इंसान बनें।

अपने समाज के लिए जिम्मेदार नागरिक बनें।

और अपने देश के लिए ईमानदारी से योगदान देने का प्रयास करें।

इस दशहरे पर आइए, केवल रावण दहन न देखें।

अपने भीतर की एक बुराई को छोड़ने का संकल्प भी लें।

🙏 आप सभी को विजयादशमी और दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ!

🚩 जय श्री राम!

🔱 हर हर महादेव!

🇮🇳 भारत माता की जय!

— देव वैदिक
मेरी सोच… मेरे शब्द… हमारे भारत के लिए…
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